21.8.16

अल्पसंख्यक


"समाज देश में राजनैतिक नियम फिजिक्स या गणित की तरह एक समान नहीं होते।  यह नियम समयस्थान, परिस्थिति अनुसार लगातार बदलते है ।  
कुछ दलों के नेताओं ने  सत्ता में रहने के लिए 127 करोड़ टीम इंडिया को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक में बाँट दिया। अब प्रश्न यह है कि अल्पसंख्यक कौन है ?  मन में ढेरों प्रश्न है। देश में अल्पसंख्यक घोषित करने के क्या मापदण्ड हैइसकी क्या परिभाषा हैसीमापार से आया घुसपैठिया जो उस पार  बहुसंख्यक है ,सीमा पर करते ही कैसे अल्पसंख्यक हो जाता है ? अल्पसंख्यक शब्द आज एक धर्म विशेष का पर्यायवाची शब्द बन कर रह गया है
मजेदार बात यह है कि सरकार व् मीडिया में डिबेट के समय अन्य अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता ! मीडिया TRP के चक्कर में पक्षपात सा करता नजर आता है सभी घोषित अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर केवल एक वर्ग सभी अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता नजर आता है।
हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति में शायद ही अल्पसंख्यक का कहीं प्रयोग हुआ हो। जैसा कि  हम सब ही जानते है कि 1977 की जनता क्रांति ने केंद्र में एक पार्टी का एकाधिकार खत्म कर दिया। तब से अल्पसंख्यक वोट को लेकर  जोरदार बयानबाजी व् बहस होनी शरू होने लगी है । MY, DM , DY जैसे समीकरणों को लेकर चुनाव लड़ा जाता है । समान अधिकार प्राप्त भारत के सभी नागरिकों पर जान न देकर कुछ नेता तो सत्ता सुख की खातिर अल्पसंख्यक  शब्द को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते है। वैसे सभी जानते है हाथी के दांत खाने के कुछ और होते है और दिखने के कुछ और !   
 अल्प + संख्यक दो शब्दों से मिलकर "अल्पंख्यक" बना है।  अल्प  का अर्थ कम  व् संख्यक से आशय संख्या से है। अर्थात जिसकी संख्या कम हो वो अल्पसंख्यक । परन्तु विभिन्न धर्मों में  जनसख्या अनुपात कितना होइसकी कोई परिभाषा नहीं है। अर्थात जनसंख्या अनुपात, कुल जनसख्या का 8%, 2542% या 60%, 70% या 100 % ,कितना इसकी कोई परिभाषा नहीं है। 
अंतरराष्ट्रीय नियमोंपरम्पराओंमान्यताओं के अनुसार किसी धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक घोषित करते समय निम्न मापदंड होते है -
अल्पसंख्यक धर्म के अनुयाइयों की जनसख्या-अनुपात कुल जनसख्या का 8 % से कम होना चाहिए अर्थात 8% या उससे अधिक की जनसख्या अनुपात वाले धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक केटेगिरी में नहीं रखा सकता।"
देश में  इस समय  धर्मों के अनुयाइयों को अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है :- 
  1- मुस्लिम
2- ईसाई
3- बौध्ध
   4- -सिख,
   5- जैन 
   6- पारसी 
  यद्यपि भारत में यहूदी धर्म के अनुयाइयों का अनुपात भारत की कुल जनसख्या से काफी कम है ,को अल्पसंख्यक नहीं माना जाता। शायद उनका चुनावी वोट कम है ,इसी लिए उनको  उपरोक्त ग्रुप में नहीं रखा गया। भारत में अल्पसंख्यकों को  विशेषाधिकार  प्राप्त है जिनमें सरकारी नौकरियों में 5% आरक्षण भी  शामिल है 
आज जिस प्रकार से रोजगारशिक्षा  व् विशेषकर कुछ राज्यों में सुरक्षा कारणों  से लोगों का  लगातार पलायन हो रहा हैइससे देश के कई राज्यों जिलों कस्बों आदि में बहुसंख्यक जनसख्या अनुपात में  बड़ा बदलाव आ गया है व् उनकों वहां पर अल्पसंख्यक कहा जा सकता है। जिसमें उनकी सुरक्षा,  रोजगार , धार्मिक आजादी  पर उचित ध्यान  देने की जरूरत है। 
धार्मिक पर्व स्वछंद रूप से मनाने की  समस्या पैदा हो रहीं है। पश्चिम बंगाल इसका जीता जागता उदाहरण है।  
बहुसंख्यक वर्ग को समझ में नहीं आ रहा कि उसे अल्पसंख्यक माना जाए या बहुसंख्यक।
 उत्तर प्रदेश, बिहार, आसाम, J & K  राज्य   के कुछ  जिलों में बहुसंख्यक  जनसख्या अनुपात में बदल गया है।  वहां राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक घोषित वर्ग को, क्षेत्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक है  ऐसे में उनके हितों की रक्षा करनी जरूरी है  
   शामली के कैराना से सुरक्षा के कारण पलायन , कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का पलायन इसके ज्वलंत उदाहरण है।   मजेदार बात यह है कश्मीर में ६८% मुस्लिम होने के बावजूद अपने को अल्पसंख्यक घोषित कर अल्पसंख्यकों को मिंलने वाली  छात्र वृत्ति ले रहें है। इसी तरह का वाद माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल भी रहा है।   यह तो यही बात हुई अंधा बनते रेवड़ी फिरी फिरी अपनों को दे ।
 देश में घोषित अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक अनुपात देख आप ज़रा सोचिये कौन बहुसंख्यक है ? स्पष्ट है जनसख्या अनुपात में  सुरक्षा व् अन्य कारणों से पलायन के कारण अल्पसंख्यक व् बहुसंख्यक का घोषित करने का कोई भी मापदंड स्थाई नहीं है। यह निरंतर चलने वाली प्रकिर्या है, तथा हर दस वर्ष बाद होने वाली जनगणना के साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक- बहुसंख्यक घोषित करने का प्रावधान  भी  किया जाना चाहिए ताकि उसी के अनुसार सभी के रोजगार , सुरक्षा , धार्मिक आजादी की नीति बनायी जा सके 
यदि नेता वास्तव में समान अधिकार प्राप्त  सभी  भारतीयों का विकास करना चाहते है तो अल्पसंख्यक व् बहुसंख्यक  के नाम पर फूट  डालने से बाज आये। 
यदि चुनावी मजबूरी के कारण ऐसा करना जरूरी लगे तो फिर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आंकड़े राष्ट्रीय जनसख्या स्तर के साथ-साथ राज्यजिलातहसील आदि के आधार पर एकत्रित किये जाने चाहिए। और उसी  जनसंख्या अनुपात के आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की श्रेणी बननी चाहिए  ताकि सभी भागों के अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक  विकास हो।  सभी भारतीयों की शिक्षाचिकित्सा रोजगार सुरक्षा की गारंटी हो। सुरक्षा के अभाव में किसी भी राज्य जिले या तहसील स्तर के सख्या अनुपात में अंतर होने पर क्षेत्रीय अल्पसंख्यक का कैराना आदि की तरह पलायन न हो  एक समान विकास हो।  
आइये मिलकर विचार करें । अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के नाम पर डिवाइड एंड रूल करने वाले नेताओं का भंडा फोड़ करे ।  विकास की राजनीती करने वाले नेताओं को आगे लाएं। तभी सच्चे अर्थों में 127 करोड़ लोगों की टीम इंडिया की सही मायनों में जीत होगी । देश बढ़ेगा तो हम बढेंगे ।
जय हिन्द जय भारत ! 

24.7.16

अल्पसंख्यक - अग्रवाल समाज

अग्रवाल समाज का योगदान भारतीय समाज व् देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था में किसी से छुपा नहीं। यह समाज भारत के हर राज्यों में बसा है। साथ ही दुनिया की आर्थिक ताकत वाले देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैंड आदि में इसकी उपस्तिथि देखी जा सकती है। शिक्षा,चिकित्सा, रोजगार, धार्मिक कार्यों आदि में इस समाज का योगदान देखते ही बनता है। 
अग्रवाल समाज 18 गोत्रों का एक समूह है। गोत्र महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रो  नाम- 1-ऐरन 2-बंसल, 3- बिंदल ,4- भन्दल ,5- धारण , 6- गर्ग , 7- गोयल , 8- गोयन,  9- जिंदल , 10- कंसल ,11- कुच्छल , 12- मधुकुल , 13- मंगल , 14- मित्तल  ,15- नागल , 16—सिंघल , 17- तायल ,18- तिंगल पर आधारित है।   
127 करोड़ की भारत की जनसंख्या में इस समाज की जनसख्या का हिस्सा एक प्रतिशत से भी क्म है। प्रत्येक दस वर्ष में एक बार होने वाली जनगणना में अग्रवाल समाज के अलग से आंकड़े इकट्ठे नहीं किये जाते। यही कारण है, इस समाज की सही तस्वीर देश-दुनिया के सामने नहीं आ पाती।  
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार किसी देश में यदि क्सिी वर्ग/धर्म की आबादी 8 % या उससे अधिक हो तो उसे अल्पसंख्यक नहीं माना जाता। परन्तु भारत में अग्रवाल समाज की जनसख्या देश की कुल जनसख्या का १% से भी कम है, को अल्पसंख्यक वर्ग में न रखबहुसख्यक वर्ग में रखा जाता है।
 जैसा कि मालूम है कि भारत में इस समय जातियों-धर्म समूहों को अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखा गया है  1- मुस्लिम, 2--ईसाई, 3--बौध्ध  4- सिख  5- जैन, 6--पारसी।  यह बात अलग है जब अल्पसंख्यक की बात होती है तो केवल मुस्लिम वर्ग ही मीडिया में अल्पसंख्यकों का नेतृत्व करता नजर आता है। क्या आपने कभी किसी जैन, बौध्ध, सिख आदि को T.V. की किसी डिबेट में अल्पसंख्यकों  के ऊपर होने वाली बहस रूप में देखा हैयद्यपि अन्य अल्पसंख्यकों की जनसख्या  मुस्लिम आबादी के राष्ट्रीय स्तर पर २५% से काफी कम है। 
  यदि राज्य स्तर पर U.P जैसे राज्य को देखा जाए तो लगभग 20 से ज्यादा जिलों में मुस्लिम आबादी 40% या उससे भी अधिक है, इसमें मुजफ्फरनगर जिला भी शामिल है।
अतः स्पष्ट है 1% से कम का जनसंख्या वाले अग्रवाल समाज को भी जैन धर्म की ही तरह अप्लसंख्यक वर्ग में शामिल किया जाना चाहिए।  
अग्रवाल समाज इस समय गम्भीर संकट के दौर से गुजर रहा है। इस वर्ग में बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। बेरोजगारी के कारण विवाह-शादी की समस्या उत्प्न्न हो रही है। दहेज़ की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया  है। शिक्षा,चिकित्सा के लिए संघर्ष करना पड रहा है। गांव- देहात,कस्बों से अग्रवाल समाज का सुरक्षा के अभाव में पलायन आम बात है। कैराना हो या अन्य जगह इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है
 सरकार को वोट बैंक की  राजनीति  से हटकर  इस समाज की ओर ध्यान देना चाहिए।  साथ ही अग्रवाल समाज के प्रबुद्ध जनों को भी समाज के उत्थान के लिए अपना रोजगार , शिक्षा , चिकित्सा व् सामाजिक कार्यों जैसे विवाह शादी में यथा संभव योगदान देना  चाहिए। यही चंद प्रयास महाराजा अग्रसेन की विरासत को बचाने में मील का पत्थर साबित होंगें। 
 - सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 

 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

आशा है   “सबका साथ सबका विकास के मूल मन्त्र वाली केंद्र सरकार अग्रवाल समाज की समस्या की ओर ध्यान देने की कृपा करेगी। जयहिंद !






24.3.16

मुज़फ्फरनगर "-NCR" से उपनगरीय रेल सेवा


राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत बसे मुज़फ्फरनगर से हजारों की संख्या में यात्री मेरठ, मोदीनगर, गाजियाबाद, दिल्ली, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार आदि  स्थानों पर आते-जाते है। यह शहर रेल मार्ग व सड़क मार्ग से इन स्थानों से भली-भांति जुड़ा है। परन्तु मुजफ्फरनगर बाई-पास बन जाने के कारण अंतर्राज्जीय बसें शहर के बाहर से ही निकल जाती हैइसी लिए यहां दैनिक यात्री रेल पर अधिक निर्भर है, दूसरे रेल मार्ग से सड़क मार्ग के जाम से जूझना भी नहीं पड़ता। गाजियाबाद से सहारनपुर-हरिद्वारतक इस रेल मार्ग का बिजलीकरण भी हो चुका है। मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद से मेरठ सिटी से मुजफ्फरनगर तक रेल मार्ग  के दोहरीकरण का कार्य चल रहा है। अभी हाल ही में मुजफरनगर से टपरी (सहारनपुर) तक के रेलमार्ग के दोहरीकरण का  उद्घाटन भी किया जा चुका है। केंद्र सरकार राज्य सरकार के साथ मिल,  इस क्षेत्र के रेल विकास में महत्त्वपूर्ण व सराहनीय कार्य कर रही है। इसी माह आनंद विहार से मेरठ तक नई मेमू ट्रेन चलाई गई जो केंद्र सरकार का अन्यन्त ही सराहनीय कदम है।इसका विस्तार मुजफ्फरनगर तक किया जाना चाहिए  
इस मार्ग पर लम्बी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों चलती हैजिसमें जनरल कोच यात्रियों की संख्या को देखते हुए न के बराबर है। इस रेल रुट पर यात्रियों की संख्या को देखते हुए रेल मंत्रालय,मोदी सरकार से अनुरोध है कि लोकल यात्रियों के हित व परेशनियों को देखते हुए मुजफ्फनगर से दिल्ली, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार के लिए उत्तर रेलवे  (दिल्ली मंडल) के अंतर्गत आने मुज़फ्फरनगर  रेलवे स्टेशन से शामली की तरह उपनगरीय ( Suburban) रेल  शटल की तुरंत शुरूआत की जानी चाहिए।  इससे जहां यात्रियों को सुविधा अपनी शिक्षा , चिकित्सा ,रोजगार व अन्य जगहों में आने जाने में लाभ होगा , मुजफ्फरनगर का विकास होगा , रेलवे की आय बढ़ेगी।  मोदी सरकार का  "सबका साथ व सबका विकास" का सपना भी पूरा करने में मदद मिलेगी। क्या केंद्र की मोदी सरकार जनता के इस सपने को पूरा करेगी ?125  करोड़ टीम इडिया को होली की शुभकामनाओं देते हुए मोदी सरकार से  मुजफ्फरनगर से उपनगरीय रेल सेवा की दशकों से पुरानी मांग पूरा करने का  बुरा ना मानों होली है कि  तर्ज पर विशेष अनुरोध करें।   


25.12.15

Twins नामकरण

 बिटिया की चिंता सभी माता-पिता को होती है। आजकल परिवार में बच्चों की संख्या एक या दो तक ही सिमट जाने के कारण तो बिटिया का महत्व और भी बढ़ जाता है, उसकी बालपन की अटखेलिया एक सुखद की अनुभूति देती है। 

बात वर्ष 2015 की है! जब परिवार में नातिन ट्विन्स का सुखद आगमन हुआ।  आस-पड़ोस, रिस्तेदार सभी ट्विन्स की  एक जैसी शक्ल देख चकित होते व् बड़े व् छोटे ट्विन्स में भेद कर पाने में असमर्थ रहते।   ट्विन्स अभी कुछ ही दिन के हुए थे तो उनके  नामकरण को लेकर माथापच्ची शुरू हो गई।  जबकि पहले जमाने में नाम को लेकर इतना झमेला न था।
  बच्चे का नामकरण मिठाई-फल-फूल या भगवानों के नाम पर रख कर काम चला लिया जाता  था।  इमरती, राबड़ी, चमेली ,गुलाबोअनारकली, शिवापार्वतीराधाकन्हैया  आदि-आदि। ये कुछ  इसी तरह के कुछ  उदाहरण है। हाँ यह बात जरूर है कि कुछ धार्मिक प्रवर्ती वाले लोग पंडित जी से जन्मपत्री में  नामकरण करवा लेते है ।  
 परन्तु नेट-गूगल की  दुनिया ने पूरी दुनिया ग्लोबल कर दिया।  तकनीक ने भाषा-धर्म की दीवार को मिटा दिया ।  
इस पोस्ट में भी इसी तकनीक का  कमाल है, ब्लॉग लिखने में रोमन की बोर्ड से,  रोमन में हिंदी  लिखा जा रहा है। 
खैर  जो भी हो हम मुख्य मुद्दे पर आते है। इस आपाधापी के युग में बच्चों का नाम यूनिक हो, इसी को लेकर आज  नामकरण में राशिअक्षर , स्पेलिंग के साथ-साथ एक अलग से पहचान वाला नाम रखने की परम्परा शुरू हो गई है। 
 इसी भाव से उन दिनों  ट्विन्स के नामकरण को लेकर भी परिवार में यही  रस्साकसी चल रही थी । कोई परिवार में अक्षर पर ध्यान देता तो कोई राशि पर।  
सभी पारिवारिक लोगों से ट्विन्स के नामकरण के सुझाव मांगे गए। यद्यपि ट्विन्स नामकरण के चुनाव की  वीटो पॉवर माताश्री के पास ही थी ।  
 परिवार के सदस्यों की भूमिका  मार्गदर्शक मंडल की तरह थी। UNO में तो  वीटो पॉवर पांच देशों है परन्तु यहाँ  माताश्री का एकाधिकार  था।  
  नामों को  गूगल पर सर्च किया जाने लगा। माताश्री दवरा  नाम में कोई न कोई  कमी या किन्तु-परन्तु कर , रिजेक्ट कर दिया जाता। उन दिनों नामों की इसी उधेड़बुन में लगभग तीन-चार माह से ज्यादा का समय बीत गया। 
अब समस्या यह उत्पन्न हुई हमशक़्ल ट्विन्स को क्या कह कर पुकारा जाए। घर के तजुर्बेकार सदस्यों ने एक काम चलाऊ कार्यवाहक सरकार की तरह ट्विन्स के पैदा होने के समय के अंतर को  पैमाना मान -छोटे-बड़े को आधार बनाकर निक नेम दे डाले।  
पहला नामकरण हुआ -छोटे बेबी का ! जो बड़े बेबी से केवल एक मिनट छोटा था– नाम मिला  -छुट्टन !  बड़े बेबी को  भी परी  नाम से पुकारा जाने लगा । मै आज यहाँ  यह स्पष्ट करता चलूँ ,  कि  इन दिनों छोटे बेबी ने  "छुट्टन" नाम पर  एतराज जता यह  बोल दिया है- " नानू  मुझे छुट्टन ना कहा करों !  
 
खैर अब मूल बात पर  आते है।  ट्विन्स के नामकरण को लेकर काफी माथापच्ची हो चुकी थी, अंत में माताश्री को  समझाया गया कि  दिल्ली नगर निगम में एक तय समय सीमा के भीतर ही बिना नाम वाले जन्म प्रमाण पत्र में  एप्लिकेशन /एफिडेविट देकर  नाम दर्ज कराया जा सकता है। अतः अब और देरी  नहीं करनी चाहिए।  
 तय समय बीत जाने पर  बिना नाम वाले जन्म प्रमाण पत्र में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करना करना में बड़ा ही झंझंट होगा। 
आखिरकार नामों की अंतहीन रेस में हार मान, माताश्री ने ट्विन्स के नामों की अनमने मन से हाँ में  मोहर लगा दी । 
नामों की स्वीकृति देते समय माता श्री की हालत ठीक वैसे थी जैसी कोई फलों टोकरे में रखे  असंख्य फलों को देखकर कभी इस फल का चुनाव करता है तो कभी उसे फल का।   

 फल चुनने वाला हर बार पहला  फल चुनने के बाद दूसरे फल की ओर इस उम्मीद से लपकता है क़ि शायद दूसरा उससे कहीं ज्यादा अच्छा हो । 
 खैर राम-राम श्याम-श्याम करते , अंततः ट्विन्स का नामों को  सदा के लिए अंतिम रूप दे  निगम व अन्य सरकारी रिकॉर्ड दर्ज करा दिया गया।   नाम वाला बर्थ सर्टिफिकेट ले माताश्री ने उसे  को चूम लिया व  धीरे से ट्विन्स को उन्ही नामों से ऐसे पुकारा जैसे उन्हें जीवन भर के लिए नामों की एक नई पहचान मिल  गयी हो।  
  मां  की खुशी देख लगा मानों ट्विन्स ने भी मुस्कराते हुए नामों की  मौन स्वीकृति दे दी हो। 

जय हिन्द! जय भारत !



13.10.14

कम्युनिकेशन स्किल


निबंध व्  कम्युनिकेशन स्किल

कम्युनिकेशन स्किल या संचार कौशल-माहरत वो कला है, जिसमें एक व्यक्ति अपनी बात दूसरे तक मौखिक ,  लिखित , पिक्चर , इशारे आदि के माध्यम से प्रभावी ढंग से पहुँचाता है lआज जीवन के हर क्षेत्र में कम्युनिकेशन स्किल या संचार कौशल या लेखन शैली का बड़ा रोल है l अखबार, किताबें, फ़िल्में, फ़िल्मी गाने , साहित्य , नेताओं के भाषण आदि एक बेहतरीन प्रभावी कम्युनिकेशन कौशल का ही नमूना है l ग्लोबल होती दुनिया में    नौकरी के क्षेत्र में कम्युनिकेशन स्किल रखने वाले व्यक्ति की भारी मांग है l किसी साहित्यकार , पत्रकार , टीचर , नेता , अभिनेता , लेखक आदि का कॅरियर उसके कम्युनिकेशन स्किल या संचार कौशल-माहरत पर ही निर्भर करता है l आज कुछ लोग कम्युनिकेशन स्किल की योग्यता अंगरेजी को ही मानते है ,पर ग्लोबल होती  हिन्दी, जिसे हम हिंगलिश  (जिसमें हिन्दी , अंग्रेजी व् अन्य भाषा के वो  शब्द भी शामिल हो जो हमारी रोजमर्रा की बोल चाल में प्रयोग होते है ) भी कह सकते है,  में कम्युनिकेशन स्किल के महत्व को नकारा नहीं जा सकता l  इसका ताजा उदहारण हमारे प्रधानमंत्री  मोदी जी है जो हिन्दी में ही कम्युनिकेट करते है l हिन्दी के प्रभावशाली कम्युनिकेशन स्किल के कारण वह हिन्दुस्तान ही नहीं अमेरिका तक में छा गए l  मोदी जी  का – “सबका साथ, सबका विकास का नारा ,125 करोड़ भारतीयों में ही नहीं भारतीय मूल के लाखों अमेरिकियों में भी सिर चढ़ कर बोल रहा है l    
स्कूलों में विशषकर 6th से 12th  तक  हिन्दी , इंग्लिश  विषय की परीक्षा में निबंध लिखने को आता है l   निबंध लेखन से छात्रों में संचार-कौशल , कम्युनिकेशन स्किल का डवलपमेंट होता है, जो जीवन भर काम आता  है l 
  विद्यार्थी जीवन में निबंध के जरिये कम्युनिकेशन स्किल की एक घटना मुझे आज तक याद है l  8th की अर्धवार्षिक परीक्षा में हिन्दी विषय की परीक्षा में निबंध का  विषय  था -  “वर्षा ऋतु  का वर्णण” l मै  निबंध बिना याद किये ही अपने मन से लिखता था l  किसान परिवार में जन्म होने व् खेत पर काम करने के अनुभव ने मुझे कल्पनासील बना दिया l  खेत में पानी देते समय मै खेत की मेंढ पर बैठ,  गन्ना चूसते हुए झींगुर की आवाज , मेंढक की  टर-टर , सुनसान अंधेरी रात में खेतों में उड़ते जुगनू को देख ,विचारों में खो जाता और  तारों की घनी छाव में बराबर में लालटेन व् फावड़ा रख , प्रकृति की खूबसूरती का मन से निहारता l भला ऐसे विचारक को वर्षा ऋतू का निबंध लिखने में क्या दिक्कत हो सकती थी l
मेरे  निबंध लिखने की कला गुरू जी भा गई l पूरी कक्षा के सामने मुझसे मेरा लिखा निबंध पढ़वाया गया l  डर  से बुरा हाल था l कारण मैंने निबंध किसी किताब से याद न कर अपनी कल्पना से लिखा था l सभी सहपाठी  निबंध बड़ी तल्लीनता से सुन रहे थे l अंत में गुरू जी ने मुझसे पूछा – “ निबंध कौन सी किताब से याद कर लिखा ? / मैंने डरते हुए सारा किस्सा ब्यान कर दिया l सर! वर्षा ऋतू पर लिखा गया  यह  निबंध मैंने स्वयं अनुभव कर अपनी कल्पना से लिखा है l मै  रात में अपने खेत में पानी देने जाता  हूँ l इस लिए मैंने जैसा देखा , अनुभव किया लिख दिया l गुरू जी ने पूरी क्लास के सामने मेरे लेखन को सराहा बोले  - “बताओं कितने नंबर दूँ “? 
 तो ये है कम्युनकेशन स्किल का कमाल ! आज ब्लॉगिंग भी कम्युनिकेशन स्किल डेवलमेंट का ही एक हिस्सा है जिसमें  अनजाने भी हमारे विचारों से प्रभावित हो टिप्पणी करने को विवश हो जाते है l आइये   भावी पीढ़ी में अच्छी कम्युनिकेशन स्किल का विकास करने में अपना अपना यथासंभव योगदान दें ? 



12.2.14

सूचना अधिकार( RTI ) के अन्तर्गत दिल्ली की बिजली वितरण कम्पनियां?

 दिल्ली सरकार ने  दिल्ली की  बिजली वितरण कम्पनियों  का CAG ऑडिट का आदेश दिया है / जो एक स्वागत योग्य कदम है / परन्तु बिजली-उपभोगताओं के हित  में  सरकार को अभी बहुत कुछ करना बाकी है जैसे तेज चलते बिजली के सभी मीटरों की जांच व् यदि आवश्यकता हो तो उनका उपभोगता के हित में तुरंत रिप्लेसमेंट / जांच से ही  सच्चाई का पता लगाया जा  सकता है कि क्या  वास्तव में  बिजली मीटर तेज चल रहें है या  ये उपभोगता का केवल शंका है /
  अभी हाल ही में मुझे  BSES यमुना पॉवर लिमिटेड  के  दिलशाद गार्डन, कस्टमर केयर कार्यालय में बिजली के नए घरेलू  कनेक्शन के सम्बधं में जाना पड़ा / जहाँ पता चला कि  उपभोगता  दवरा सभी बिल देने के बावजूद , सालों पुरानी देय राशि नाम पडी है/ ऐसा   बिजली वितरण  की गलती के कारण एक ही उपभोगता के नाम दो-दो बिल जारी करने से हुआ है /  इस बकाया राशि का उपभोगता को पता तब चलता है जब कोई बिजली उपभोगता    दूसरे  नये  घरेलू कनेक्शन के लिए या “ no Dues Certificate “ के लिए आवेदन करता है / 
सरकार व् बिजली वितरण कंपनी को इस त्रुटि को तुरंत दूर कर  ठीक करना चाहिए /  ताकि  निर्दोष व्  ईमानदार  उपभोगता को अनुचित  मानसिक व् आर्थिक दंड  परेशानी से बचाया जा सके  /
 अभी तक दिल्ली की  बिजली वितरण कंपनी सूचना के  अधिकार ( RTI) के तहत नहीं आती है , सरकार  को CAG ऑडिट के साथ-साथ उपभोताओं के हित बिजली वितरण कम्पनियों को सूचना अधिकार के अंतर्गत भी लाना चाहिए / 

7.7.13

थॉमस माल्थस का जनसंख्या सिधांत व् प्राक्रतिक आपदा


32 वर्षीय  बिर्टिश  अर्थशास्त्री  थॉमस माल्थस ने वर्ष 1798 में    "An Essay on the Principle of Population" में  जनसंख्या   सिन्धांत प्रतिपादित  किया ! जिसमें  अन्य बातों  के   अलावा यह  भी बताया कि  प्रक्रति   बढती जनसंख्या  को  अपने  संसाधनों के अनुरूप  नियंत्रित  करती रहती है/   जनसंख्या  बढ़ोतरी  ज्यामितीय  (geometrically)  तरीके से बढती  है जैसे - 1, 2, 4, 16, 32, 64, 128, 256 etc/  भोजन  व् अन्य  प्राक्रतिक साधन अंकगणितीय (arithmetically) तरीके  से / जैसे -1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, etc.
इसी  से  जनसंख्या,  भोजन व्  प्राक्रतिक  साधनों में अंतर गड़बड़ा  जाता है  और  प्रक्रति  को उसमें संतुलन   स्थापित करना पड़ता  है/
कुछ उपायों में   जनसंख्या रोक पर प्रक्रति-कुदरती तरीके से रोक लगाती है / भूख,  महामारी, अकाल, बीमारी, प्राक्रतिक-आपदा, युद्ध  जैसी विभीषिका   उन्हीं   तरीकों में शामिल है / ये प्रक्रति का   जनसख्या व् अपने संसाधनों में   संतुलन- सामंजस्य   बनाने का तरीका है /  तुलसीदास-रामचरित मानस की चौपाई में –“ऐहिक देविक भौतिक तापा”  का उल्लेख है /
  अतीत में हुए अकाल, महामारी, युद्ध, प्राकृतिक-आपदा जिसमें  सुनामी, बाढ़, भूकंप आदि इसके  उदाहरण  है/ अभी हाल ही में  आई उतराखंड - केदार नाथ तीर्थ स्थान पर आई आपदा जिसमें हजारों लोग अकाल  म्रत्यु को  प्राप्त हुए इसका ताजा उदाहरण  है / ये केदारनाथ में जनसंख्या विस्फोट यानी प्राक्रतिक संसाधनों व् जनसंख्या की बीच असंतुलन का ही परिणाम है/  देश व् विदेश में  रोजाना आतंक की घटनाएं घट  रही  है जिसमें   सैकड़ों लोग असमय मौत का  शिकार हो रहें है, भी जनसंख्या विष्फोट का परिणाम है /
 समाधान एक ही है- जनसंख्या विष्फोट से बचा जाए   ताकि प्रक्रति  व् जनसंख्या के बीच असंतुलन न पैदा हो व्   समय रहते   प्रथ्वी   जैसे रहने  लायक किसी अन्य गृह  की खोज  की जाए/ जनसंख्या का एक स्थान पर केन्द्रीय करण की जगह विकेन्द्रीयकरण (पलायन ) ही इसका एक   मात्र हल  है / इससे प्रक्रति का संतुलन बरकरार रहेगा /अन्यथा संकुचित होते प्रक्रति  साधनों के  कारण प्रक्रति को थॉमस माल्थस की  जनसंख्या  की थ्योरी पर अमल करने को मजबूर होना पड़ेगा/ और जब तक प्रक्रति  जनसंख्या व अपने साधनों में संतुलन नहीं कर लेती तब तक   असमय  , क्रूर  म्रत्यु का शिकार होना पड़ेगा/ अब देखना है  प्रक्रति  बुध्धिमान है या  मनुष्य ?

ढंडेरा नगर पंचायत (रूड़की)-में जल निकासी की समस्या

देश के अन्य राज्यों के अतिरिक्त , योगी   जी के उत्तरप्रदेश,धामी जी उत्तराखंड   में भी केंद्र सरकार द्वारा  अनेकों   योजना     की   लागू कर ...